प्राचार्य मधुकरजी पवार ( Madhukar Pawar) का शैक्षणिक योगदान

‘तिनका तिनका जोडकर आशियाँ बन जायेगा
हम चले तुम भी चलो कारवा बन जायेगा
शक्ति है संकलप है मनमें है उंची उड्डान
कुछ दिनो मे देखना तु आसमाँ बन जायेगा’

प्राचार्य मधुकरराव पवार एक एँसा व्यक्तित्व है जो लाखो करोडों के भिड में चिराग लेकर ढूंढने से भी बडे मुश्किल से मिल जाये । जो केवल कृति मे विश्वास रखते है और जिस बात  को मन में ठान लेते है फिर वह पुरा कर के ही दम लेते ही चाहे फिर कितनी ही मुश्किले क्यों ना आये । एँसा लगता है मानो उद्देश नहीं इस जीवन का प्रांत भवन में टिक रहना परंतु पहुचना उस सीमा तक जिसके आगे राह नही ।एँसा अदभूत व्यक्तित्व 18 जून 1958 में जनुना नामक एक छोटासा बार्शिटाकली तहसिल स्थित गाँव जो अकोला जिला अंतर्गत है । जहाँ दरिद्रता के सिवा अन्य कुछ भी नही था ।

Prof Madhukar Pawar
अत्यंत दयनीय अवस्था में इनका लालन पालन हुआ । परिवार बडा था परंतु दयनीय अवस्था के कारण परिवार भी उसही अवस्था में अपने एक एक दिन बिता रहे थे । परिस्थिती नाजूक होने के कारण दो । वक्त की रोटी बडी मुश्किल से मिल जाती थी । और आज मधुकर पवार एक गाँव एक शहर या एक जिला बल्की एक राज्य तक सिमित न होते हुये पुरे देश में वह जगह जगह अपने समाज के विकास उसके सामाजिक, आर्थिक, राजनितीक उन्नति हेतू दिन रात अपने आप को समर्पित कर चुके है । बंजारा जनजाति पूरे भारत देश में फैली हुई है, जिसकी कुल संख्या 5 कोटी है, जो शिक्षा से कोसों दूर स्थित नजर आती है । वे भलिभाति जानते थे कि यदि यह समाज इसी तरह शिक्षा से दूर होता गया तो यह समाज कभी अपना विकास नही कर पायेगा । इसलिए उन्होंने दयनिय स्थिती में मजदुरी कर विपरित परिस्थिती में एम. फिल तक शिक्षा पूर्ण की । और राधादेवी गोयनका महाविद्यालय में प्राध्यापक पद पर कार्यरत हुए और यही से उनके जीवन का महत्त्वपूर्ण दौर शुरु हो जाता है । पैसो की कमी दयनिय अवस्था की चरन सीमा परंतु मन में विश्वास और समाज के लिए कुछ करने की तमन्ना हो तो फिर रास्ते मे चाहे कितनी भी बडी रुकावटे क्यों न हो मंजिल मिल जाती है ।

कभी फुलो से जला हूं कभी आग से खिला हूं मै मुसीबतों का पाला बडे प्यार से पला हूं मेरे साथ अब न कोई है सिवा मेरी खुदी के मै हूं काफिलें में तनहा मैं अकेले काफिला हूं । जब मन में ठान लिया की कुछ भी हो जाए परंतु अनपढ समाज हेतू शैक्षिक संथाएँ निर्माण करनी है, और यह उसीका नतीजा है कि आज मधुकर पवार, साहब की अकोला जिला अंतर्गत 13 शैक्षिक संस्थाएँ केवल बंजारा समाज नही तो बल्की संपूर्ण भारतीय समाज के कई जातियों जन जातियो के बच्चे नर्सरी से लेकर पदवित्तर तक शिक्षा से अवगत रहे है जिसमें गुलाम नबी आझाद कला, वाणिज्य व विज्ञान महाविद्यालय बार्शिटाकली गुलाम नबी आझाद कला, वाणिज्य व विज्ञान कनिष्ठ महाविद्यालय, एमसीव्हीसी महाविद्यालय बार्शिटाकली, कला महाविद्यालय, मुर्तिजापूर, रंगलाल भासू नाईक विमुक्त पिछडी जनजाति आश्रम शाला जनूना जि. अकोला, बाबुसिंगजी माध्यमिक आश्रम शाला जनूना जि. अकोला. महात्मा ज्योतिबा फुले विद्यालय पिंजर जि. अकोला, नाईक सार्वजनिक वाचनालय जनूना जि. अकोला, शामकी माता प्राथमिक शाला पिंजर जि. अकोला, गोल्डन ज्युबली सेन्ट्रल अकादमी कॉन्व्हेट बार्शिटाकली जि. अकोला, आदि इसमें कुल 4000 छात्र छात्राएँ शिक्षा अर्जित कर रहे है । यह इनकी एक अमूल्य घरोवर है । जिसमें केवल बंजारा समाज ही नही बल्की सामान्य से सामान्य वर्ग के बच्चे भी जिन्हें शिक्षा मिलना दुर्लभ था उसे सुलभ बनाकर उनहे अपने पैरों पर खडे होने का अवसर प्राप्त हो रहा है । ‘मैं नदिया का बहता पाणी मेरा औ हौर ठिकाणा क्या वापस लौट नही सकता में पनघट से यारना क्या सुख के साझेदार बहुत है दुख के हिस्सेदार नही खुदगरजो की इस बस्ती में अपना क्या बेगाना क्या’ प्राचार्य मधुकर पवार का शैक्षणिक योगदान अमूल्य है । इसलिए उनके संपूर्ण व्यक्तित्व, सामाजिक, राजनितिक तथा शैक्षणिक क्षेत्र में दिए गए बहुमूल्य योगदान के लिए उन्हे कई सारे महत्त्वपूर्ण पुरस्कारो से सम्मानित भी किया गया ।
प्रा. प्रविण देशमुख
हिंदी विभाग प्रमुख
गुलाम नबी आझाद कला,
वाणिज्य व विज्ञान महाविद्यालय बार्शिटाकली

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