रविराज टी.राठोड

“किसी कवि ने क्या खूब लिखा है”
बिकरहा है पानी कहीं पवन बिक न जाए.. बिक गयी है धरती कहीं गगन बिक न जाए,
चाँद पर भी बिकने लगी है जमीं अब
डर है की सूरज की तपन बिक न जाए ,
हर जगह बिकने लगी है स्वार्थ की नीति अब डर है की कहीं धर्म बिक न जाए ,
देकर दहॆज ख़रीदा जा रहे है दुल्हे
कही उसी के हाथों दुल्हन बिक न जाए,
हर काम की रिश्वत ले रहे अब ये नेता अधिकारी कही इन्ही के हाथों वतन बिक न जाए ,
सरे आम बिकने लगे है जनता द्वारा चुने गए सदश्य सांसद.. डर है की कहीं ग्राम पंचायत से संसद भवन बिक न जाए ,
इंसान मर भी गया तो रहती है खुली आँखे शायद डरता है मुर्दा कहीं कफ़न बिक न जाए,
दोस्तो जागो और जगावो समाज को सबकुछ बेच दो पर खुदका जमीर मत बेचो.. इन्सान बनकर जन्मे हम इन्सानियत के लिए निस्वार्थ कर्तव्य निभाकर जावो,

आपका व समाज का शुभ चिंतक
रविराज टी राठोड़,
प्रधान संपादक
राज-बंजारा हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र

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सौजन्य-: गोर गजानन डी.राठोड
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