भीमणीपुत्र बापू के “गोरपान”किताब से बंजारा लोकगीत का सौंदर्य एंव विश्लेषण – गजानन धावजी राठोड

गोर बंजाराके महान साहित्यिक भीमणीपुत्र मोहन नाईक अपनी प्रस्तुत पुस्तक में गोरबंजारा ‘लोकगीतों के संदर्भ और आयाम’ में पहली बार बंजारा गीतों के साहित्यक सौन्दर्य के विश्लेषण विवेचन के साथ उनके सांगीतिक पहलुओं रसों पर भी समुचित प्रकाश डाला है।बहुमुखी प्रतिभा की धनी भीमाणीपुत्र हैं।।अतः उन्होंने अपनी इस कृति में साहित्य और संगीत–लोकगीतों के दोनों पक्षों का समुचित, संतुलित और सर्वांगीण चित्र प्रस्तुत किया है।विभिन्न क्षेत्रों के बिखरे-पसरे बंजारा लोकगीतों के संग्रह और फिर उनके मनन मंथन में उन्होंने कई वर्षों तक अथक परिश्रम किया है।फलतः उनका यह शोधपरक विश्लेषण और निरूपण गोरबोली भाषा में एक मील का पत्थर’ बनकर उभरेगा, ऐसा मेरा विश्वास है।
कोश शैली मैं लिखी, ऐसी अनुपम उपलब्धि एवं सार्थक कृति के लिये उन्हें हार्दिक बधाई और स्नेहाशीष भी।
उनके शब्दों में, ‘‘लोक हमारे जीवन का महासमुद्र हैं, जिसमें भूत, भविष्य और वर्तमान संचित हैं।अर्वाचीन मानव के लिये लोक सर्वोच्च प्रजापति है।’लोक’ शब्द का अर्थ जनपद या तांडासे से न लेकर नगरों व गाँवों में फैली उस समूची जनता से लिया है जो परिष्कृत, रुचिसंपन्न तथा सुसंस्कृत समझे जाने वाले लोगों की अपेक्षा अधिक सरल और अकृत्रिम जीवन की अभ्यस्त होती है।
‘लोकसंगीत उन लोगों के जीवन की अनायास प्रवाहात्मक अभिव्यक्ति है, जो सुसंस्कृत तथा सुसभ्य प्रभावों से बाहर कम या अधिक आदिम अवस्था में निवास करते हैं।यह साहित्य प्रायः मौखिक होता है और परम्परागत रूप किन्तु वास्तव में लोकगीत का तात्पर्य लोक में प्रचलित गीत ही है।
लोक द्वारा निर्मित होने पर भी लोकगीत को किसी व्यक्तिविशेष से जोड़ा नहीं जा सकता, क्योंकि रचनाकार बापू को उस गीत में समस्त लोक के व्यक्तित्व को उभारना होता है।लोकसाहित्य वस्तुतः जनता का वह साहित्य है जो जनता द्वारा, जनता के लिये लिखा गया है।
‘the poetry of the people, by the people, for the people.’’
भीमणीपुत्र बापूने समस्त बंजारा समुदाय
में चेतन-अचेतन के रूप में जो भावनाएँ गीतबद्ध हुई हैं । अब यह किताबअंग्रेजी भाषामें Bhimniputra’s Gorpan: The L inguistic Beauty In Gor-Boli Dialect (A Socio-Cultural Study And Analysis ) नामकसे कुछ ही दिनोंमे worldwide online उपलब्ध होगी। जबकी सका पुरा विवेचनका जागतिक कार्य प्रा.दिनेश राठोड ने किया है।उन्हे इस संशोधनों के लिए राष्ट्र रत्न पुरस्कारसे सन्मानित कीया गया है। यह किताब आप जरूर पढीये। और गोर संस्कृति की वैज्ञानिक वैश्विकता की अपनाईऐ।।
*जय गोर जय गोर*

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