“बंजारा समाज के छात्रो को संदेश”

जय सेवालाल..
अपने देश के उन्ह गरीब छात्रो को एक संदेश। देना चाहता हूं। चाहे कोई भी रहो..राजनेता, मंत्री या बाँलीऊड के हिरो उनके प्रभाव को देखकर आगे बढते चलना चाहिये. क्यो की इंसान पैसों। से या बापजादो की दौलत से सही पहचान नही करवाता..बल्की अपने खुद के बलबूते पर खुद के अंदर का विश्वास जगाना हर इंसान का सबसे बढा कर्तव्य हैं। आज हम एसे कुशलता नेतृत्व वाले इंसान के बारे मे जानना चाहते हैं। जो रांई से पहाड बनानै मे सफल हैं। मै कोई राजनितीक हिसाब से नही बल्की एक समाज सेवक कि हैसियत से सभी छात्रो को यह बात कहना चाहता हूं।उठो और आगे बढो..। आप की काबिलीयत एक दिन जरूर रंग लायगी..
हमारे देश के प्रधान मंत्री मा.श्री
नरेंद्र दामोधरदास मोदी आज भले ही एक ऐसे कुशल प्रशासक के रूप मे उभरे हो जो अपने नजरिए को चुटीले शब्दों मे लपेटकर रखना जानता है, लेकिन उनकी जिंदगी की कहानी बिल्कुल सीधी-सादी है जिसमे हमे कहीं-कहीं बेशक बिंदास छवि के नजारे भी मिलते है, एक चाय दुकानदार के बेटे से लेकर देश के सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री बनने तक का उनका समूचा सफर ऐसे चौंकाने वाले किस्सो और घटनाओ से भरा पड़ा है जिनसे उनकी शख्सियत को आकार मिला है.
उत्तरी गुजरात के वडनगर रेलवे स्टेशन पर एक छोटी-सी चाय की दुकान के मालिक दामोदर दास मोदी के घर 1950 में जन्मे नरेंद्र तीन कमरो के छोटे-से घर मे छह भाई-बहनों के साथ पले-बढ़े, बचपन के दिनो मे नरेंद्र मोदी स्कूल से लौटकर अपने पिता की दुकान पर उनकी मदद किया करते थे और अक्सर केतली मे चाय लेकर ग्राहको तक पहुचाया करते थे, वडनगर के श्री बी.एन. हाइस्कूल में मोदी ग्यारहवीं तक पढ़े, वहा उन्हे मेधावी छात्र माना जाता था, आश्चर्य नहीं कि वे अपनी कक्षा मे सबसे अच्छे वक्ता थे और स्कूल के नाटको मे हिस्सा लिया करते थे, एक बार उन्होंने भावनगर के महाराजा का किरदार भी निभाया था, वे शिक्षा के इतर गतिविधियो मे सक्रिय रहते थे और एनसीसी के एक कुशल कैडेट भी थे, वडनगर मे रहने वाले उनके सहपाठी सुधीर जोशी बताते हैं, ‘‘वे वाकई बहुआयामी थे.’’ उनके अन्य सहपाठी नागजी देसाई, जिनके साथ मोदी काफी समय बिताया करते थे, कहते हैं, ‘‘वे स्कूल मे जो कुछ भी करते थे, उसमे अव्वल रहते थे.’’
मोदी 1965 में 15 बरस की उम्र मे आरएसएस नेता बाबूभाई नायक के प्रभाव में आकर आरएसएस की शाखा में जाने लगे, इसके कुछ दिनो बाद ही उन्होंने स्वामी विवेकानंद को पढऩा शुरू कर दिया, जिनकी शख्सियत और उपदेशो के वे मुरीद हो गए थे, इसके अलावा वे दो स्थानीय सर्वोदयी नेताओं द्वारकादास जोशी और रसिकलाल पारिख के विचारो से भी प्रभावित थे, इतनी सारी प्रेरणाओ का ही असर रहा कि उनके भीतर आरएसएस के सिखाए प्रखर राष्ट्रवाद और सर्वोदय आंदोलन का गांधीवाद दोनो का मिश्रण पनपा, उनके 17 वर्ष का होने के बाद के पांच वर्ष काफी उथल-पुथल वाले रहे और शायद यही उनके जीवन का वह हिस्सा था जिसने उनके व्यक्तित्व पर सबसे गहरा प्रभाव डाला, जब वे बमुश्किल 18 बरस के थे, तब उनके माता-पिता ने उनकी इच्छा के विरुद्व उनके ही घांची (तेली) समुदाय की लड़की जशोदाबेन से मोदी की शादी करवा दी, मोदी को एक ओर आरएसएस और सर्वोदय की विचारधारा सार्वजनिक सेवा की ओर प्रवृत्त कर रही थी तो दूसरी ओर एक पति के तौर पर घरेलू जिम्मेदारियां आन पड़ी थी, युवा मोदी इस दोतरफा दबाव को झेल पाने में काफी दिक्कत महसूस कर रहे थे, आखिर उन्होंने अपनी पत्नी से खेद जताया कि वे पहले यह फैसला ले पाने के लायक इतने मजबूत नहीं थे और फिर घरबार छोड़कर तीन महीने के लिए वे हिमालय के एकांत मे चले गए, वहां से वे घर नही लौटे, बल्कि अहमदाबाद मेअपना स्थायी ठिकाना बनाया..।

सौजन्य:गोर कैलास डी.राठोड
स्वयंसेवक गोर बंजारा संघर्ष समिती भारत, तथा चिफ एडीटर गोर बंजारा आँन लाईन न्युज पोर्टल.
Website: www.goarbanjara.com
मो.9819973477

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