“टूटते परिवार, दरकते रिश्तें”

“टूटते परिवार, दरकते रिश्तें”
एक समय था, जब लोग समूह और परिवार मे रहना पसंद करते थे।जिसका जितना बड़ा परिवारहोता वो उतना ही संपन्न और सौ भाग्यशाली माना जाता था और जिस परिवार में मेल-मिलाप होता था और संपन्नता होती थी उसकी पूरे क्षेत्र में प्रतिष्ठा रहती थी।वह ऐसा समय था, जब समाज मे परिवारों का बोलबाला था और समाज में संपन्नता की निशानी परिवारकी प्रतिष्ठा से लगाई जाती थी। उस दौर में व्यक्ति की प्रधानता नहीं थी,बल्कि परिवारों की प्रधानता थी।परिवार के धनी लोगों की बिरादरी में विशेष इज्जत होती थी और ऐसे लोग पूरे समूह और समाज का प्रतिनिधित्व करते थे। बड़ेपरिवार का मुखिया पूरे समाजका मुखिया बनकर सामने आता था और उसकी बात का एक विशेष वजन होता था।संयुक्त परिवारों के उस दौर में परिवार के सदस्यों में प्रेम,स्नेह, भाईचारा और अपना पण का एक विशिष्ट माहौल रहता था। इस माहौल और संयुक्त परिवारों का फायदा परिवार के साथ पूरेसमाज को मिलता था और जो पूरे समाज और राष्ट्र को एकसूत्र में बांधने का संदेश देता था।
****कैलास डी.राठोड****
स्वंय सेवक गोर बंजारा संघर्ष समिती…

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