गोरचिंतन

मारो मन पराजीते न पुछो , तु केर कन जाणो पसंद करेची भिया,

पराजीत बोलो ,म असे लोकुर शिकार करूचु ,जो मोह ,लालची,
व्यसनी, लोभी ,धन, पिसा अडका वास ,पद प्रतिष्ठा वास, जो खुदेर जमीर रिस्ते, नाते ,मित्रता, ए से चिंजे दावेपर लगाडच असे लोकुर कन जाणो म घणणो पसंद करूचु।
कारण असे लोक घण झल्दी मार जाळेम फसजाच, मार नाम भी हेजावच “पराजित”।

मन पुछो तु कसे लोकु कन जायेसनी?

म असे लोकुकन जाउनी जो।
निस्वार्थ समाजेर सेवा करच
प्रभुर ध्यान चिंतनेम हमेशा डुबे रच असे लोक जीव देनाकिये पण मोह ,माया ,व्यसन ती घणदुर रच वो झल्दी फसेनी मार टाईम वेस्ट हे जावच वत अन असे लोकुकनच “जीत”हमेशा बेठी रच ।

उदा:gbss स्वंयम जो काम कररेच वो फसेनी करन उनुर स्वंयम सेवक बडरेच अन “जीत”वत घर करन बेसगीच।

भियाओ जुडो अन जोडो अब
आचेदाड आरेच ये पवित्र कामेर
हिस्सेदार बणो अन आपणो जीवन सफल बणावो।
हे ईश्वर हमार जीत हमेशा हमार कन रेदेस मार समाजेन एक मुटठी करन वोरो हक्क मळादेस
सत्ये र विजय असो।

                              किसु

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