खामोशी, कवी – विनोद राठोड

खामोशी

एक काले टीले पर खड़ा
मैं कूछ कहता हुँ तो
तो चारों और गूँजती है
मेरे अपने शिकस्त की आवाज
नजरों के सामने एक मैदान है
अरमानोंके घोड़े दौड़ते हुये
ये मैदान , मैदान नही
रणभुमी है…..!
रणभूमी मुझे निहारती है
रणभूमी मुझे पुकारती है
रणभूमी मुझे ऊकसाती है
ऐ धरती के राजपूत्र
आओ ऐ योद्धा
अब तुम्हें ऊतरना ही होगा
मैदान – ए – जंग मे
कौण तुम्हारा अपना है
कौण बेगाना है
सोचना फिजूल है
जलदी बतावो
न्याय अन्याय के इस युध्द मे
तूम कौणसा रथ चुनोगे
उसके अनुसार ही
तुम्हारा सारथी चुना जायेगा
मैदान की तरफ देखते हुये
मैंने मुस्कुराते हुये कहा
देख ऐ मैदान – ए – जंग
बिना तलवार के
कोई लढाई हो तो बता
जीसमे ना किसीकी जीत
ना किसीकी हार हो..
मैदान बहुत देर तक खामोश रहा..
उसकी खामोशी
बहुत कुछ कह गयी
बिना कुछ बोले….

विनोद राठोड

कवी – विनोद राठोड
कल्याण

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